स्वच्छ भारत अभियान

छुट्टी का दिन हो तो एक सुख तो होता है, सूरज सर पर आ जाए तब तक तसल्ली से सो सकते हैं, दो अक्तूबर को हमने भी अच्छी तरह नींद का आनंद लिया, फिर हाथ मुँह धो कर हमने अपने मोहल्ले के मशहूर हज्जाम रामलाल की दुकान का रुख़ किया जो आम के पेड़ के नीचे अपनी दुकान सजाता है.

दुकान पर पहुँचा तो देखा एक टीवी डिबेट वाला माहौल बना हुआ है, राम लाल किसी टीवी एंकर की भूमिका निभा रहा है और कुछ गरमा गरम बहस चल रही है. एक बार तो लगा कि कहीं मैं अपने टीवी सेट के अंदर ही तो नहीं घुस गया हूँ. राम लाल का ध्यान आकर्षित करते हुए मैने बोला “भाई शेव बना दे”

“अरे सिंह साहब आइए आइए, बस दो नंबर और हैं, फिर आपकी बारी, बैठिए” राम लाल ने जवाब दिया

ऐसे शाही दुकानों पर लकड़ी का बेंच ही वेटिंग रूम का काम करता है तो हम वहाँ जम गए और पड़ोस वाले कुमार और गली के आख़िरी घर मे रहने वाले मित्तल साहब के साथ बैठ गए.

अभी हमने सामने पड़ा पंजाब केसरी उठाया ही था कि राम लाल की आवाज़ कानों मे पड़ी “सिंह साब आप ही बताइए इससे फ़र्क पड़ेगा या नहीं?”

“शेव से? भाई उम्मीद तो है कि संदीप सिंह से सीधा हृतिक रोशन बन जाऊँगा, बाकी देखते हैं”, मैने उत्तर दिया.

“अरे नहीं नहीं सिंह साहब, इस स्वच्छ भारत अभियान से”, मित्तल जी ने बात थोड़ी स्पष्ट की.

“फ़र्क तो पड़ेगा भाई, हम सब अपना अपना कचरा सॉफ करेंगे तो देश सॉफ होगा या नहीं”, कुमार मुँह मे दबाया गुटखा बाहर थूकने के बाद बोला.

“बिल्कुल, और देखिए, आज सुबह ही नई कचरा डालने की पेटी भी रख गए हैं गली मे. बहुत ही बड़ी लोहे की पेटी है. रोज़ सफाई कर्मचारी खाली करेंगे”, रामलाल ने कुमार की बात को आगे बढ़ाया.

अब हमसे भी रहा नहीं गया और लगा कि हमें भी इस बहस मे कुछ योगदान देना चाहिए तो राम लाल से पूछ बैठे, “तो तुम ये रोज़ जो बाल सड़क किनारे छोड़ जाते हो, वो पेटी मे डाल जाया करोगे?”

“अरे नहीं नहीं, वो तो सफाई कर्मचारी का काम है ना, हम तो सारा कचरा इकट्ठा कर सड़क किनारे रख देंगे, आगे जिसका काम, वही करे. इस पेड़ के आस पास कचरा नहीं छोड़ेंगे, इतना पक्का है”, राम लाल ने जवाब दिया.

इतने मे कुर्सी पर बाल कटवा रहे सज्जन बोल पड़े, “यही तो मैं कह रहा हूँ कि दिक्कत है. सफाई कर्मचारी होता है सरकारी. सरकार काम करे तो बात ही क्या है. वो कुछ करेंगे नहीं और हम तुम क्या कर लेंगे. सब बेकार की बातें हैं.”

मैने एक आह सी भारी और वापिस पंजाब केसरी मे छपी दीपिका पादुकोण की तस्वीर पर ध्यान लगा लिया लेकिन मित्तल जी हार मानने के मूड मे नहीं थे. वो बोले, “अरे भाई हम सब अपना कचरा उस पेटी मे डालेंगे तो गली तो वैसे ही सॉफ रहेगी ना. सफाई कर्मचारी का काम उस पेटी को अपने ट्रक मे खाली भर करना रह जाएगा. कहाँ गली गली, घर घर वो कचरा इकट्ठा करता फ़िरेगा?”

कुमार जी को ये बात शायद कुछ पसंद नहीं आई, नाक सिकोडते हुए बोले, “भाई फिर हम टैक्स क्यूँ देते हैं. इन सफाई कर्मचारियों की पगार हम आप जैसे लोग ही देते हैं. और इसके बदले मे उन्हे कुछ काम तो करना पड़ेगा ना.”

“बिल्कुल सही कह रहे हैं कुमार साहब”, रामलाल ने कुमार के स्वर मे अपना स्वर मिलाया.

अभी मैं सोच ही रहा था कि पेड़ के नीचे दुकान लगाने वाला टैक्स देता है या नहीं कि मित्तल जी फिर बोल पड़े, “भाई प्रधानमंत्री ने बोला है तो हम तो अपना योगदान देंगे, बाकी जिसकी जैसी मर्ज़ी. हम अपनी गली मोहल्ले को सॉफ रखने की कोशिश करेंगे”

तत्पश्चात बात नई फिल्म बैंग बैंग और कटरीना पर मुडी और कुछ हमारे मतलब की बहस हुई.

शेव बनवाने के बाद घर की ओर जाते हुए रास्ते मे हमारी नज़र बड़े से डब्बे पर पड़ी जिसपर पीले अक्षरों मे “नगर निगम” लिख रखा था. कचरा पेटी तो अच्छी बड़ी थी, दो दिन छोड़ कर भी खाली करते रहें तो शायद गली का कचरा निकलता रहे.

अगली सुबह वापिस शेव करवाने पहुँचे तो छूटते ही राम लाल बोला, “इस देश का साला कुछ नहीं हो सकता”

“भइया क्या हुआ, सुबह सुबह किसने मूड खराब किया?”

“साहब जो कल कचरा पेटी रख गए थे नगर निगम वाले, वो कल रात ही कोई चुरा ले गया. लोहा बेच दिया होगा कबाड़ी बाज़ार मे”

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